Monday, March 12, 2007

पता नहीं...

पता नहीं... तुम्हें पुराना कुछ याद होगा भी या नहीं...

सारे पहर, अपना शहर, भीड़ का कहर...
उस भीड़ में तुम मुझे-मैं तुम्हें- खोजते थे...
खोजते-खोजते छुपते-छुपाते हम ही फिर खोते थे...
एक ही लोकल के अलग डिब्बों मे जैसे ठुँसे होते थे...

झेंपना-झेंप कर नज़रें चुराना होता था,
अंजान बन कर एक दूसरे का मज़ाक उड़ाना होता था.
मज़ाक भी सच होगा- कभी सोचा नहीं था,
भीड़ में भी भरी आँखों को मैंने पोंछा नहीं था.

अब उम्र खिसक रही है दबे-दबे पाँवों से,
राह अँधिया गई है यादों की घनी छांवों से,
छांवों में भी तपिश है, मन जल रहा है,
भीड़ में एक बार फिर खोने को तनहा चल रहा है...

मैं लौट आऊँगा, ज़ख्म धो जाऊँगा,
खुद को वहीं पाऊँगा,भीड़ में खो जाऊँगा,
तुम्हे तुम्हारा अपना कोई भेजेगा भी? पता नहीं!
तुम आओगी भी? पता नहीं
तुम आई, तो तुम्हें कुछ याद आएगा भी? पता नहीं....
पता नहीं... तुम्हें पुराना कुछ याद होगा भी या नहीं....

(An interpretation of Marathi poem by Kishore 'Saumitra' Kadam.)

No comments: